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बगुले की हिन्दी कहानी Bagule Ki Kahani panchtantra kahani

 एक साधारण चरवाहा था| उसका नाम था मूसाई| एक दिन वह गाये  चरा रहा था|एक बगुला 🦢 उड़ता आया और उसके पैरों के पास गिर पड़ा|मूसाई ने बगुले को उठा लिया|संभवतः बाज  ने बगुले को घायल कर दिया था|उजले पंखों पर रक्त के लाल-लाल बिन्दु थे|


bagule ki kahani panchtantra kahani


बेचारा पक्षी  बार-बार मुख फाड़ राहा था|मूसाई ने प्यार से उस पर हाथ फेरा|जल के समीप ले जाकर उसके पंख धोए|थोड़ा जल चोंच मे भी डाल दिया|पक्षी मे साहस आया|थोड़ी देर मे वह उड़ गया|इसके थोड़े दिन बाद एक सुंदर धनवान लड़की ने मूसाई के माता से प्रार्थना की और उससे मूसाई का विवाह हो गया|


       मूसाई बहुत प्रसन्न था,उसकी स्त्री  बहुत भली थी|वह मूसाई और उसकी माता की बहुत मन लगाकर सेवा करती थी|वह घर का सब काम अपने- आप कर लेती थी|मूसाई की माता तो अपने बेटे की स्त्री की गाँव भर मे प्रशंसा ही करती फिरती थी|उसे घर के किसी भी काम मे तनिक भी हाथ नहीं लगाना पड़ता था|


      भाग्य की बात – देश मे अकाल पड़ा|खेतों मे कुछ हुआ नहीं|मूसाई मजदूरी की खोज मे माता तथा स्त्री  के साथ टोकियो नगर मे आया|मजदूरी कहाँ जल्दी मिलती है ? मूसाई के पास के पैसे खर्च हो गए थे|उसको उपवास करना पड़ा|तब उसकी स्त्री ने कहा – ‘मै मलमल बना दूँगी|तुम बेच लेना|लेकिन जब मै मलमल बूनू तो मेरे कमरे मे कोई ना आवे|’


       मूसाई की समझ मे कोई बात नहीं आयी|वह नहीं जनता था की उसकी स्त्री मलमल कैसे बनाएगी?लेकिन मूसाई सीधा था|उसे अपनी स्त्री पर पूरा विश्वास था|उसकी स्त्री ने पहले कभी झुट नहीं कहा था|फिर पास मे पैसे थे नहीं | किसी प्रकार कोई पैसे मिलने का रास्ता निकले तो घर का काम चले |

       

मूसाई स्त्रीकी बात चुप-चाप मान ली|स्त्री जब उससे कुछ मांगती नहीं तो उसकी बात मान लेने मे हानी भी क्या थी|उसने अपनी माता से कह दिया की जब उसकी स्त्री अपना कमरा बंद कर ले तो कोई उसे पुकारे नहीं और ना उसके कमरे मे भी जाए | 


दूध के समान उजला मलमल और उस पर छोटे-छोटे लाल छीटे – मूसाई की स्त्री ने जो मलमल बनाई वह अद्भुत थी|रेशम के समान चमकती थी 🔆 | बहुत कोमल थी|जब मूसाई उसे बेचने गया तो खुद राजा मिकाडो ने मलमल खरीदी | मूसाई को सोने की मुहरे मिली|अब तो मूसाई धनी हो गया|उसकी स्त्री मलमल बनाती और वह बेच लाता|

      

  एक दिन मूसाई ने सोचा –‘मेरी स्त्री ना रुई लेती है, न रंग | वह मलमल कैसे बनाती है ?’


        मूसाई छिपकर खिड़की से देखने गया, जब स्त्री ने मलमल बनाने का कमरा बंद कर लिया था | मूसाई ने देखा की भीतर स्त्री नहीं है|एक उजला बगुला बैठा है | वह अपने पंख से पतला तार नोचता है और पंजों से मलमल बुनता है |उसके गले मे घाव है | घाव का रक्त वह पंजेसे वस्त्र पर छिड़ककर छीटे डालता है |मूसाई ने समझ लिया की वही बगुला स्त्री बना है और उपकार का बदला दे रहा है |


        मूसाई को बाडा आश्चर्य हुआ | एक छोटे बगुले ने उपकार का ऐसा बदला दिया है; यह सोंचकर उसका हृदय भर आया | उसकी आँखों मे आँसू आ गये | वह जहा – का – तह हद रह गया | वह उस बात को भूल गई की उसकी स्त्री ने मना किया है की मलमल बुनते समय कोई उसे देखने ना आवे | 


उसे तो यह भी याद ना रहा की वह यह क्यों खड़ा है|इसी समय मूसाई की माता ने पुकारा | मूसाई बोल पड़ा | बगुला चौंका और खिड़की से उड़ 🕊️ गया. जो जीवों पर दया करता है, उसे अवश्य बड़ा लाभ होता है|        

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